कहानी नागपुर-चंद्रपुर की: कोयला खदानों और ताप विद्युत् संयंत्रों से मंडरा रहा क्षेत्र के जल संसाधनों पर खतरा

ताप विद्युत् संयंत्र एवं कोयला खदान दो ऐसे प्रकल्प हैं जो किसी क्षेत्र एवं उसके संसाधनों को प्रदूषित करने में काफी बड़ी भागीदारी रखते है| इन दोनों प्रकल्पों की प्रक्रियाएं बड़ी मात्रा में अपशिष्ट/कूड़ा-कचड़ा उत्पन्न करती हैं| उपरी सतह से निकाली गयी पत्थर-मिट्टी (ओवर बर्डन), खदानों से बाहर आता बहाव (माइन ड्रेनेज) दो ऐसे अपशिष्ट/कूड़े-कचरे हैं जो की कोयला खदानों से काफी अधिक मात्र में उत्पन्न होते हैं| और यदि हम कोयला आधारित ताप विद्युत् संयंत्रो की बात करे तो वहां कोयले के जलने से उत्पन्न फ्लाई ऐश/राख/राकड़ उसमे काफी मात्रा में उत्पन्न होतीं हैं|

नागपुर और चंद्रपुर महाराष्ट्रा के दो ऐसे जिले हैं जहाँ पे ताप विद्युत् संयंत्र एवं कोयला खदान दोनों हीं प्रकार के प्रकल्प मौजूद हैं| मंथन अध्ययन केंद्र की टीम ने इन जिलो में छह कोयला खदानों एवं दो ताप विद्युत् संयंत्रो का दौरा किया| इस दौरे में हमारी टीम ने इन दोनों प्रकल्पो से निकलने वाला अपशिष्ट/कूड़ा-कचड़ा के अनुचित प्रबंधन एवं उसका प्रभाव देखा|

कोयला खदानों द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट एवं उनके प्रभाव:

  1. खदान से निकली हुई पत्थर-मिट्टी (ओवर-बर्डन):

किसी भी खनन की प्रक्रिया में खनिज तक पहुचने के लिए ज़मीन की सतह को खोदा जाता है| उस खोदने की प्रक्रिया में बहुत सारी पत्थर-मिट्टी अपशिष्ट के तौर पर बहार आती है| खदान से निकली हुई पत्थर-मिट्टी (अंग्रेजी में ओवर-बर्डन), की प्रबंधन की ज़िम्मेदारी खदान प्रशासन की होती है| नागपुर शहर के समीप खापरखेडा गाँव के पास एक कोयला खदान से निकली पत्थर-मिट्टी कन्हान नदी के तट पर डाल दी गयी|

तस्वीर 1: कन्हान नदी के तट पर ओवर-बर्डन/ खदान की पत्थर-मिट्टी और खापरखेडा ताप विद्युत् संयंत्र से आता पानी  और ऐश का मिश्रण (फोटो: मंथन अध्ययन केंद्र)

ऐसी स्थिती में बहुत अधिक सम्भावना रहती है की बारिश के दिनों में पत्थर-मिट्टी के अम्बार से आने वाले पानी के बहाव के कारण पत्थर-मिट्टी सीधा नदी में चली जाये| पत्थर-मिट्टी का अम्बार नदी में गिरने से अधिक गाद की समस्या प्रस्तुत होती है| किसी भी नदी में अधिक गाद होने से उस नदी की जल ढोने/वहन की क्षमता में कमी आती है| कुछ मामलों में खदान से निकली पत्थर-मिट्टी में कई तरह के प्रदूषण फैलाने वाले खनिज भी होते हैं, जैसे: हैवी मेटल्स, जो की पत्थर-मिट्टी के अम्बार से आने वाले जलीय अपवाह एवं लीचिंग के माध्यम से नदी में प्रवेश कर जाते हैं और नदी के पानी की गुणवत्ता एवं जलीय जनजीवन/इकोसिस्टम पर बुरा प्रभाव डालते हैं|

यहाँ पे खदान से निकली हुई पत्थर-मिट्टी के प्रबंधन का सवाल तो है हीं, साथ ही साथ किसी भी खदान का किसी सतह के जल के स्त्रोत के समीप होने के कारण से उस जल स्त्रोत को होने वाले नुक्सान का भी प्रश्न आता है|

2. खदानों से बाहर आता बहाव ( माइन ड्रेनेज):

खदानों के अन्दर जल को प्रवेश करने के कई माध्यम होते हैं, जैसे: बारिश, भूगर्भीय जल का रिसाव, खदानों के भीतर उपयोग में लाया जाने वाले जल| खनन के काम को जारी रखने के लिए आवश्यक होता है की खदान सूखा रहे, तो इसके लिए खदान में जमे पानी को यांत्रिक पम्पस की सहायता से बहार निकला जाता है| इसी बाहर आते स्त्राव को खदान का बहाव अथवा माइन ड्रेनेज (अंग्रेजी में) कहते हैं| खदान का बहाव अम्लीय/एसिडिक, अलकलाइन एवं न्यूट्रल भी हो सकता है| (George R. Watzlaf 2004).

चंद्रपुर शहर से थोड़ी दूरी पर स्थित घुघुस शहर के समीप नायगांव कोयला खुली खदान है| मंथन अध्ययन केंद्र की टीम ने नायगांव कोयला खुला खदान से बाहर निकलता हुआ बहाव कुछ दूरी पर बह रही वर्धा नदी में जाकर मिलता हुआ पाया| उपयोग में लाये गए pH मीटर पर इस स्त्राव का माप 3.93 दर्शा रहा था, जो की ये अत्यंत अम्लीय/एसिडिक है| ये स्त्राव, पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 की धारा 3(1) के अंतर्गत दी हुई अनुसूची संख्या 1 में मौजूद इंट्री संख्या 90(3) में दिए हुए pH के मानक का भी उल्लंघन कर रही है|

तस्वीर 2: नायगांव कोयला खदान से आता स्त्राव वर्धा नदी में मिलते हुए (फोटो: सहर, मंथन अध्ययन केंद्र)
तस्वीर 3: नायगांव कोयला खदान से आता स्त्राव वर्धा नदी में मिलते हुए (फोटो: गूगल सॅटॅलाइट इमेज)

इसी तरह का अम्लीय/एसिडिक स्त्राव माजरी कोयला खुली खदान से बाहर आता हुआ पाया गया और बिना किसी उपचार के कोंढ़ा नाला नामक एक प्राकृतिक नाला में मिलता हुआ पाया गया| और यही कोंढ़ा नाला थोड़ी दूर नीचे जाकर वर्धा नदी में समाहित होता है| यहाँ पर ये स्त्राव, जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के धारा 24(1)(a) का उल्लंघन करता है| किसी भी जल स्त्रोत में ऐसा अम्लीय/एसिडिक स्त्राव उसके जल की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव डालते हैं|

तस्वीर 4: माजरी कोयला खदान से आता स्त्राव की पाइपलाइन (बायें)  और (दायें) कोंढ़ा नाला (फोटो में दर्शित नहीं) की ओर जाता हुआ स्त्राव एवं पाइपलाइन  (फोटो: आशीष, मंथन अध्ययन केंद्र)

कोयला आधारित ताप विद्युत् संयंत्रो द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट एवं उनके प्रभाव:

  1. कोयले की राख/राकड़

कोयले की राख वो अपशिष्ट है जो की कोयला के जलने के बाद उत्पन्न होती है| नागपुर शहर से थोड़ी दूरी पर खापरखेडा कोयला आधारित ताप विद्युत् संयंत्र द्वारा उत्पन्न राख/राकड़/फ्लाई ऐश एक राख के तालाब/ ऐश पौंड में संचित की जाती है| उस राख के तालाब से थोड़ी दूरी पर स्थित गाँव वारेगाँव का दौरा करने पर वहां के लोगो से राख के तालाब/ ऐश पौंड से उडती राख से आने वाली दिक्कतों का पता चला| वहां के लोगों के अनुसार हवादार दिनों में ऐश पौंड से राख उड़कर उनके घरों में आ जाती है| उनके घरों के छतों एवं गाड़ियों पर हर सुबह राख जमा मिलती है| उनकी फसल राख के कणों से भरी रहती है, जिससे उन्हें बाज़ार में सही कीमत नहीं मिलती| गाँव में कई लोग अस्थमा एवं त्वचा की बीमारी से ग्रसित हैं| उनके खेतों तक में राख जमा मिलती है| उनके पीने के पानी के बर्तनों में भी राकड़ प्रवेश कर जाती है जिससे उनके पीने का पानी भी प्रदूषित हो जाता है|

पर्यावरण और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार की 1999 में कोयला आधारित ताप विद्युत् संयंत्र द्वारा उत्पन्न फ्लाई ऐश के इस्तेमाल करने को लेकर एक अधिसूचना के अनुसार खापरखेडा ताप विद्युत् संयंत्र को 100% फ्लाई ऐश का इस्तेमाल कर लेना था| परन्तु, पर्यावरण और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नागपुर स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की 15 अप्रैल 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 2 सालो में उपयोग केवल 36% और 35% है| इस वजह से वारेगाँव की स्थिती और भी खराब होती जा रही है|

निरीक्षण के रिपोर्ट में ये पाया गया है की खापरखेडा कोयला आधारित ताप विद्युत् संयंत्र द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले कोयले में 38-42% राख की मौजूदगी है जो की पर्यावरणीय मंज़ूरी की शर्तो के अनुसार 34% या उससे कम होनी चाहिए| फ्लाई ऐश के निराकरण के लिए उसे जल के साथ मिलाकर ऐश पौंड में डाला जाता है| (CENTRAL ELECTRICITY AUTHORITY 2012)| कोयले में जितनी अधिक राख की मौजूदगी होगी, उतना ज्यादा फ्लाई ऐश की उत्पत्ति उसके जलने पे होगी और उतना ही ज्यादा उसके डिस्पोजल के लिए पानी की खपत होगी| पानी के खपत के नज़रिए से ज्यादा राख वाले कोयले का उपयोग बिलकुल भी सही नज़र नहीं आता|

खापरखेडा ताप विद्युत् संयंत्र के ऐश पौंड के समीप पानी और राख के मिश्रण से भरा एक नाला नज़र आया जो खापरखेडा ऐश पौंड की दीवार की तरफ से आता दिख रहा था| गूगल सॅटॅलाइट से ले गयी तस्वीर के मुताबिक़ यही नाला आगे चलकर कन्हान नदी में मिलता है|

तस्वीर 5: खापरखेडा ऐश पौंड की ओर से आता नाला (फोटो: सहर, मंथन अध्ययन केंद्र)
तस्वीर 6: पानी और ऐश से मिश्रित नाला खापरखेडा ऐश पौंड की ओर से आता हुआ (बाएँ) और (दायें) नाले के ताल पे जमा फ्लाई ऐश (फोटो: सहर, मंथन अध्ययन केंद्र)
तस्वीर 7: खापरखेडा ऐश पौंड का गूगल सॅटॅलाइट इमेज/नक्शा

इसके अलावा खापरखेडा ताप विद्युत् संयंत्र से बाहर आता एक और पानी और राख के मिश्रण से भरा नाला नज़र आया जो भी कन्हान नदी में मिल रहा था| (तस्वीर 1)| इन दोनों जगहों से नदी में थोडा नीचे जाने पर यही पानी कन्हान शहर स्थित फ़िल्टर प्लांट द्वारा उठाया जाता है| उपचार के उपरान्त ये पानी नागपूर शहर के निवासियों को घरेलू उपयोग के लिए भेजा जाता है| पर्यावरण और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ मुल्यांकन समिति (एक्सपर्ट अप्रैज़ल समिति) ने 6 दिसंबर 2010 की बारहवी बैठक में ये माना है की फ्लाई ऐश में रेडियम-धर्मी (रेडियोएक्टिव) एवं विषैले हैवी मेटल्स पाए जाते है| इन सब चीजो को ध्यान में रखा जाए तो एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण सवाल ये खड़ा होता है की क्या कन्हान स्थित दूषित जल उपचार संयत्र द्वारा नदी से उठाये जल में से रेडियम-धर्मी (रेडियोएक्टिव) एवं विषैले हैवी मेटल्स को बाहर करने के लिए ज़रूरी कदम उठाये जा रहें है या नहीं?  

इस लेख में चर्चा किये गए सारे हालात और उल्लंघन, राज्य के प्रदूषण नियन्त्र बोर्ड एवं पर्यावरण और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की बेपरवाही या असमर्थता, जो भी कह ले, उसे दर्शाता है|

Bibliography:

Central Electricity Authority: Report on Minimization of Water Requirement in Coal based Thermal Power Plant. New Delhi: central electricity authority, 2012.

George R. Watzlaf, Karl T. Schroeder, Robert L. P. Kleinmann, Candace L, Kairies, and Robert W. Nairn. The Passive Treatment of Coal Mine Drainage. Pittsburgh, Pennsylvania: U.S. Department of Energy, National Energy Technology Laboratory & University of Oklahoma School of Civil Engineering and Environmental Science, Norman, Oklahoma., 2004.

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